समुद्र सभी के लिए एक ही है ..पर...,
कुछ उसमें से मोती ढूंढते है ..
कुछ उसमें से मछली ढूंढते है ..और,
कुछ सिर्फ अपने पैर गीले करते है..,
ज़िदगी भी...
समुद्र की भांति ही है,
यह सिर्फ हम पर ही निर्भर करता है,
कि, इस जीवन रुपी समुद्र से हम
क्या पाना चाहते है,
हमें क्या ढूंढ़ना है ?
तेरे गिरने में, तेरी हार नहीं ।
तू आदमी है, अवतार नहीं ।।
गिर, उठ, चल, दौड, फिर भाग,
क्योंकि
जीत संक्षिप्त है
इसका कोई सार नहीं ।
Tuesday, 24 January 2017
SAMUDR AND JINDAGI / JIT SANXASIPT
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